खोल दे पंख मेरे, कहता है परिंदा..
अभी और उड़ान बाकी है
ज़मीन नहीं है मंजिल मेरी,
अभी पूरा आसमान बाकी है
चलता रहूँगा पथ पर
चलने में माहिर बन जाऊंगा..
या तो मंजिल मिल जायेगी
या अच्छा मुसाफिर बन जाऊंगा
हदे शहर से निकली तो गाँव गांव चली
कुछ यादे मेरे संग पाँव पाँव चली
सफर जो धुप का हुआ तो तजुर्बा हुआ
वो ज़िन्दगी ही क्या जो छांव छांव चली
उठो तो ऐसे उठो
कि फ़िक्र हो बुलंदी को..
झुको तो ऐसे झुको,
कि बंदगी भी नाज़ करे

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